अमर शहीद चुल्हाय गोप कोसी क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी

The Bio Desk
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अमर शहीद चुल्हाय गोप कोसी क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानी

आज आप सभी के बीच एक अमर शहीद स्वतंत्रता सेनानी का कहानी लेकर आया हूं जिन्होंने 1943 में मधेपुरा की धरती पर अंग्रेजों के दफ्तर में घुस तिरंगा फहराया था। अमर शहीद चुल्हाय गोप जी को किताबों में चुल्हाय मंडल या चुल्हाय यादव के नाम से भी वर्णित किया गया है।

अगस्त क्रांति में मधेपुरा-सहरसा के कुल 9 शहीदों में केवल दो शहीदों- यदुवीर चुल्हाय गोप और धीरो राय का शव उनके परिवार को उपलब्ध नही कराया गया था।

नेपाल के ‘बकरो के टापू’ पर डॉ.लोहिया और जयप्रकाश क्रमशः ट्रांसमीटर ऑपरेटर एवं आजाद दस्ते को ट्रेनिंग देने में लगे थे और उन्होंने तय किया था कि सभी क्रांतिकारी अपने अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराएंगे।इनसे निर्देश प्राप्त कर 25 जनवरी 1943 को मनहरा गांव आये प्रखर सेनानी बाबू कमलेश्वरी प्रसाद मंडल, बाबू बीएन मंडल एवं बाबू शिवनंदन मंडल, ये वही मनहरा गांव था जहाँ के एक अहीर (गोप) किसान परिवार में चुल्हाय मंडल का 15 जनवरी 1920 को जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम फूलचंद गोप था।

 

अगस्त क्रांति के दौरान क्रांतिकारियों का मनहरा गांव में बैठक हुआ, इस बैठक में यदुवीर चुल्हाय ने बताया कि वो सबसे कम उम्र के है इसलिए उन्हें ही तिरंगा फहराने का अवसर दिया जाए और हुआ भी ऐसा ही।

बाबू कमलेश्वरी प्रसाद मंडल जी के मशविरानुसार एक धोती ओढ़े व पहने 26 जनवरी को सवेरे मधेपुरा के ट्रेजरी बिल्डिंग परिसर में पहुंच गये क्रांतिवीर शहीद चुल्हाय मंडल और तिरंगा लहराते हुए ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाने लगे।

जिसके बाद 8-10 गोरे सिपाहियों ने उन्हें पकड़ लिया। पहले तो रस्सी से 23 वर्षीय चुल्हाय मंडल का पैरों को छान दिया और मार-मारकर उन्हें लहू-लुहान कर दिया, फिर डाकबंगला रोड होकर घसीटते हुए यदुवीर चुल्हाय को डाकबंगला परिसर स्थित एक पेड़ से उल्टा लटका दिया और दो दिन-दो रात तक उस कड़ाके की ठंड में बिना वस्त्र के लाठियों की वर्षा में नहाते रहे वीर चुल्हाय।

क्रांतिवीर चुल्हाय की नाक-आँख-कान और मुँह से खून निकलता रहा और वो वंदे मातरम बोलते ही रहे। अधमरा हो जाने पर जब चुल्हाय को 29 जनवरी को जेल ले जाया जा रहा था तब रास्ते में तीन जगह उनके मुंह से खून का ‘थक्का’ गिरा। 30 जनवरी की रात को कदाचित वह शहीद हो गया थे फिर भी इलाज कराने के बहाने सिपाही उन्हें बाहर लेकर चले गए, उनकी लाश भी घरवालों को नहीं मिली।

जब देश में 15-16 अगस्त को आजादी का जश्न मना रहा था तब मधेपुरावासियों ने वहाँ-वहाँ शहीद चुल्हाय द्वार बनाकर श्रद्धांजलि निवेदित किया, जहाँ-जहाँ जेल जाते वक्त वीर चुल्हाय के मुंह से खून का थक्का गिरा था।

उसके बाद से लगभग चार दशक तक शहीद चुल्हाय इतिहास के पन्नों से गायब रहे, मधेपुरा के लोग उनकी शहादत को भी भूल गए थे। लम्बे अंतराल के बाद मधेपुरा जिला उद्घाटन की तिथि 9 मई 1981 को सामाजिक न्याय के पुरोधा जमींदार बाबू बी.पी.मंडल के अध्यक्षीय भाषण में “शहीद चुल्हाय मंडल” का नाम मधेपुरा के लोगों ने सुना और तब से इस शहीद चुल्हाय के क्रिया-कलापों को बुद्धिजीवियों तक पहुंचाने हेतु कुछ विद्वानों ने भू.ना. मंडल विश्वविद्यालय में “शहीद चुल्हाय उद्यान” बनाया।

बाबू डॉ भूपेंद्र मधेपुरी के प्रयासों से 2015 में डाक बंगला रोड का नामकरण “शहीद चुल्हाय मार्ग” किया गया।

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