बाबू जियालाल मंडल, स्वतंत्रता सेनानी व राजनेता सहरसा (बिहार)
स्वतंत्रता आंदोलनों के इतिहास में बिहार के अहीरों का अहम योगदान रहा है लेकिन अब भी कई स्वतंत्रता सेनानी गुमनामी के अंधेरे में है।
कोसी क्षेत्र, बिहार के स्वतंत्रता सेनानी जियालाल मंडल का नाम कौन नही जानता है परंतु उनके जन्मभूमि सिमरी बख्तियारपुर में उनके नाम पर कोई स्मारक या फिर संग्रहालय तक नही है। बाबू जियालाल मंडल आज़ाद भारत के सिमरी बख्तियारपुर के प्रथम विधायक और खगड़िया के दूसरे सांसद थे।

जियालाल बाबू का जन्म अहीर (यादव) परिवार में 5 मार्च 1915 को तत्कालीन मुंगेर (वर्तमान सहरसा) जिला के सिमरी बख्तियारपुर के रंगीनिया टोला में हुआ था। उनके पिता बाबू खुदर मंडल भी स्वतंत्रता आंदोलनों के अग्रणी दूत हुआ करते थे। इनके पूर्वज इस इलाके के सम्मानित जमींदार थे परंतु अंग्रेजी सरकार से बगावत के कारण जमींदारी का ज़्यादातर हिस्सा जब्त कर ली गयी थी।
प्रारंभिक शिक्षा एवं क्रांतिकारी गतिविधियां :
जियाबाबू का प्रारंभिक शिक्षा सिमरी बख्तियारपुर के एक मात्र मध्य विद्यालय सरडीहा से शुरू हुई थी। वे काफी मेधावी थे जिस वजह से चौथी कक्षा पास करने के बाद पांचवी में उन्हें स्कॉलरशिप दिया गया था। मिडिल स्कूल पास कर वो आगे की शिक्षा के लिए मुंगेर जिला मुख्यालय के तरफ रुख कर गए लेकिन सिर्फ मात्र 15 वर्ष की आयु में देशभक्ति से ओतप्रोत होकर कांग्रेस में शामिल हो गए और अंग्रेजों को देश से भगाने का उद्देश्य लेकर आज़ादी के मुहिमों में भाग लेने लगे।
1934 में बिहार में भयंकर भूकंप और कोसी के त्रासदी से त्रस्त था, जिसमें जियाबाबू ने सच्चे कृष्णवंशी की तरह पीड़ित व असहायों की मदद किया था। जियाबाबू में करुण और दया इस प्रकार भरे हुए थे कि मात्र 19 साल की उम्र में महात्मा गांधी के नजर में आ गए।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जियालाल बाबू ने अहम भूमिका निभाई थी। अंग्रेजों ने इनके घर को आग के हवाले कर इनके पूरे परिवार को मारने का असफल प्रयास किया था। जियालाल बाबू और उनके भाई अयोध्या मंडल को रेल पटरी उखाड़ने, थाना में तोड़फोड़ एवं आगजनी करने सहित अन्य विभन्न मामलों में मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया था। 1 साल तक उन्हें जेल में रखा गया था।
राजनीति :
आज़ादी के बाद 1951-52 में जब बिहार में पहली बार चुनाव हुए तब कांग्रेस ने जियाबाबू को सिमरी बख्तियारपुर सह चौथम से उम्मीदवार बनाया, वो भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुँचे। उनके अच्छे कार्यों को देखते हुए कांग्रेस ने 1957 में हुए दूसरे लोकसभा चुनाव में खगड़िया से उम्मीदवार बनाया, इस चुनाव में वो भारी मतों से विजयी हुए।
जियाबाबू पंडित नेहरू एवं इंदिरा गांधी के बहुत करीबी थे, 1962 में हुए तीसरी लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर भारी मतों से जीत हासिल किया। 1967 में हुए चौथी लोकसभा चुनाव में उनका मुकाबला दरभंगा राज के महाराज से हुआ जिसमें बहुत ही कम अंतर से उनकी हार हुई। एक बार विधायक व दो बार सांसद रहते हुए उन्होंने क्षेत्र का बहुत विकास किया, इस कारण जियाबाबू आम लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय थे।
9 फरवरी 1973 को भारत माता के सच्चे सपूत व महान स्वतंत्रता सेनानी बाबू जियालाल मंडल का मात्र 58 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।
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