रणजीत सिंह अहीर: 1857 के विद्रोह में दानापुर के विद्रोही सूबेदार और कुंवर सिंह के सेनापति

The Bio Desk
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रणजीत सिंह अहीर: 1857 के भारतीय विद्रोह के एक असाधारण नायक

रणजीत सिंह अहीर (जन्म 1811) 1857 के भारतीय विद्रोह, जिसे ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’ भी कहा जाता है, के दौरान बिहार क्षेत्र के एक प्रमुख और साहसी व्यक्तित्व थे। उन्हें विशेष रूप से पटना के निकट दानापुर छावनी (Danapur Cantonment) में हुए सिपाही विद्रोह में उनकी महत्वपूर्ण नेतृत्वकारी भूमिका के लिए याद किया जाता है। अपनी सैन्य क्षमता और साहस के कारण, उन्हें बाद में महानायक बाबू कुँवर सिंह की विद्रोही सेना के सबसे विश्वसनीय सेनापतियों में से एक नियुक्त किया गया था।

प्रारंभिक जीवन और सैन्य करियर

रणजीत सिंह अहीर का जन्म वर्ष 1811 में हुआ था। उनका पैतृक गाँव शाहपुर था, जो तत्कालीन शाहाबाद (Shahabad) जिले (वर्तमान में भोजपुर, बिहार) के बिहिया परगना में स्थित था। वह एक प्रतिष्ठित अहीर (या यादव) परिवार से आते थे।

अपनी युवावस्था में, उन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल होकर एक प्रभावशाली सैन्य करियर बनाया। वह प्रतिष्ठित बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (Bengal Native Infantry – BNI) रेजिमेंट में कार्यरत थे और अपनी बहादुरी तथा सेवा के दम पर सूबेदार के पद तक पहुँचे थे। 1857 के विद्रोह के भड़कने के समय, उनकी तैनाती पटना जिले की महत्वपूर्ण दानापुर छावनी में थी। ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते असंतोष और अपने देशवासियों की पीड़ा को देखते हुए, सूबेदार रणजीत सिंह अहीर ने तुरंत ब्रिटिशों के खिलाफ विद्रोह करने वाले प्रमुख नेताओं में अपनी जगह बना ली।
दानापुर विद्रोह और आरा पर कब्ज़ा 25 जुलाई 1857 का दिन बिहार में विद्रोह के इतिहास में निर्णायक साबित हुआ।

रणजीत सिंह अहीर: 1857 के भारतीय विद्रोह के एक असाधारण नायक
रणजीत सिंह अहीर: 1857 के भारतीय विद्रोह के एक असाधारण नायक

इसी दिन, दानापुर छावनी में तैनात बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की 7वीं, 8वीं और 40वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने संगठित रूप से विद्रोह कर दिया।

इस विद्रोह का नेतृत्व अग्रिम पंक्ति से सूबेदार रणजीत सिंह अहीर और सूबेदार सीताराम जैसे भारतीय अधिकारियों ने किया। विद्रोही सैनिकों ने तत्परता दिखाते हुए निम्नलिखित कार्रवाई की:

  • उन्होंने कई ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला।
  • उन्होंने छावनी के हथियारों के भंडार (Magazine) पर कब्ज़ा कर लिया, जिससे उनकी सेना की शक्ति में वृद्धि हुई।
  •  उन्होंने सरकारी खजाने को अपने नियंत्रण में ले लिया, जिससे विद्रोह को वित्तीय सहायता मिली।
    लगभग 2,000 विद्रोही सैनिक, रणजीत सिंह के नेतृत्व में, शीघ्र ही आरा (Arrah) शहर की ओर कूच कर गए। उनका लक्ष्य शाहाबाद क्षेत्र के सबसे प्रमुख क्रांतिकारी और ज़मींदार बाबू कुंवर सिंह से मिलना था।

26 जुलाई को, ये विद्रोही सैनिक कुंवर सिंह की सेना के साथ एकजुट हुए। इस संयुक्त बल ने आरा शहर पर सफलतापूर्वक कब्ज़ा कर लिया। 27 जुलाई से 3 अगस्त 1857 तक, रणजीत सिंह अहीर और कुंवर सिंह की संयुक्त सेना ने आरा को अपने नियंत्रण में रखा, जिससे ब्रिटिश प्रशासन को एक बड़ा झटका लगा। इस दौरान कई ब्रिटिश अधिकारियों को बंदी बनाया गया। रणजीत सिंह अहीर की सैन्य कुशलता और अद्वितीय साहस से प्रभावित होकर, कुंवर सिंह ने उन्हें तत्काल अपनी सेना के सर्वोच्च सेनापतियों (Generals) में से एक का महत्वपूर्ण पद प्रदान किया।

उत्तरी भारत में संघर्ष और गुरिल्ला प्रतिरोध

कुंवर सिंह का नेतृत्व स्वीकार करने के बाद, रणजीत सिंह अहीर उत्तरी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ब्रिटिशों के खिलाफ़ लड़ाई में एक प्रमुख कमांडर बने रहे। उनकी संयुक्त सेना ने पटना, शाहाबाद (भोजपुर), आज़मगढ़, और गाज़ीपुर सहित कई महत्वपूर्ण स्थानों पर ब्रिटिश सेनाओं को चुनौती दी।

अप्रैल 1858 में जगदीशपुर के निर्णायक युद्ध में बाबू कुंवर सिंह के घायल होने और उसके बाद उनकी मृत्यु हो जाने के बाद, विद्रोह की बागडोर संभालने की भारी ज़िम्मेदारी रणजीत सिंह अहीर के कंधों पर आ गई। उन्होंने और अन्य बचे हुए नेताओं ने हार नहीं मानी। उन्होंने शाहाबाद के घने जंगलों को अपना आधार बनाया और ब्रिटिश सेना के खिलाफ़ गुरिल्ला (Guerrilla) युद्ध शैली में प्रतिरोध जारी रखा।

इस रणनीति ने उन्हें लंबे समय तक ब्रिटिशों को थकाए रखने में मदद की।
इस संघर्ष के दौरान, रणजीत सिंह अहीर को अन्य स्थानीय क्रांतिकारी नेताओं का भी सक्रिय समर्थन मिला, जिनमें फुलवा के जगन्नाथ सिंह अहीर और मनेर के अनूप राउत प्रमुख थे। ये तीनों मिलकर ब्रिटिश सेना के लिए एक गंभीर चुनौती बने रहे।

गिरफ्तारी और शहादत की अस्पष्टता

1858 के अंत तक, ब्रिटिश प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत लगाकर विद्रोह को अधिकांश क्षेत्रों में कुचल दिया था। उन्होंने शाहाबाद के जंगलों में बचे हुए विद्रोही समूहों की गहन तलाश शुरू कर दी।
दुःखद रूप से, इस व्यापक खोज अभियान के दौरान, अंग्रेज़ों ने रणजीत सिंह अहीर और उनके कई साथियों को पकड़ लिया। उनके प्रमुख सहयोगी, अनूप राउत, किसी तरह बच निकलने में सफल रहे और वापस अपने गाँव मनेर लौट गए।

रणजीत सिंह अहीर की गिरफ्तारी के बाद उनके अंतिम समय के बारे में कोई निश्चित और आधिकारिक सूचना कभी दर्ज नहीं की गई। उनके गृह क्षेत्र शाहपुर और बिहिया में शीघ्र ही यह खबर फैल गई कि वह ब्रिटिश क्रूरता के शिकार हुए और शहीद हो गए। उनकी मृत्यु की सटीक परिस्थितियाँ, तारीख और स्थान आज भी अस्पष्ट हैं, जो उन्हें 1857 के एक अनाम (Unsung) लेकिन अविस्मरणीय नायक के रूप में स्थापित करती हैं। उनकी वीरता और बलिदान की कहानी बिहार के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

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