वीर महेंद्र गोप: बिहार का वह योद्धा जिसने अंग्रेज़ी हुकूमत की नींद उड़ा दी
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के धूल भरे दस्तावेज़ों में कुछ नाम स्याही से लिखे गए हैं, जबकि कुछ नाम बारूद और ख़ून से लिखे गए हैं। बिहार के rugged पहाड़ियों वाले क्षेत्र में एक ऐसा ही नाम आज भी लोककथाओं जैसा सम्मान रखता है। यह नाम है महेंद्र गोप। छह फ़ुट छह इंच लंबे इस क्रांतिकारी ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भागलपुर और बांका के अंग्रेज़ी शासन के लिए आतंक का पर्याय बनकर उभरे।
क्रांतिकारी बनने की कहानी
15 अगस्त 1912 को बांका अनुमंडल के अंतर्गत स्थित रामपुर गांव में जन्मे महेंद्र गोप बचपन से ही असाधारण शक्ति के धनी थे। राम सहय खिरहरी और सत्यवती देवी के पुत्र महेंद्र अत्यंत गरीब परिवार में जन्मे और कम उम्र में ही पिता का साया खो दिया। औपचारिक शिक्षा उनसे दूर रही लेकिन कुश्ती और खेलकूद के प्रति उनके लगाव ने उन्हें मजबूत काया और अदम्य साहस प्रदान किया।
ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि वे विशाल कद काठी वाले व्यक्ति थे जिनका चौड़ा माथा, छत्तीस इंच का सीना और बीस फ़ुट तक छलांग लगाने की क्षमता उन्हें असाधारण बनाती थी। मगर एक घटना ने उनके मन में क्रांति का संकल्प जगा दिया।
फुलीडुमर जाते समय ब्रिटिश पैट्रोल ने उन्हें रोका। भाषा की समस्या के कारण वह पूछताछ का जवाब नहीं दे पाए जिसके चलते अंग्रेज़ सैनिकों ने उन्हें लाठियों और सैन्य जूतों से बेरहमी से पीटा। इस अपमान ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसके बाद उन्होंने अंग्रेज़ी शासन को मिटाने का प्रण लिया। अपनी इकलौती बेटी गीता देवी के जन्म के कुछ समय बाद ही वे घर छोड़कर सशस्त्र क्रांति के मार्ग पर निकल पड़े।
गुरिल्ला युद्ध का उस्ताद
अंग्रेज़ दस्तावेज़ों में उन्हें डाकू बताया गया लेकिन वास्तविकता यह थी कि महेंद्र गोप एक अनुशासित क्रांतिकारी थे। शुरुआत में उन्होंने परशुराम सिंह के दस्ता से जुड़कर मुख़बिरों को खत्म करने और सरकारी दमन से मुकाबला करने का काम संभाला। बाद में उन्होंने लगभग 250 योद्धाओं का अपना स्वतंत्र दस्ता तैयार किया जिसमें प्रद्युम्न सिंह और श्रीधर सिंह जैसे निडर साथी थे।
उनकी रणनीति कठोर थी। उन्होंने आंदोलन के लिए धन जुटाने हेतु राजनीतिक dacoity की और किसी भी मुख़बिर को बख्शा नहीं। यहां तक कि जासूसी करने के आरोप में उन्होंने अपने सगे चाचा माधो चौधरी को भी दंडित करने का आदेश दे दिया।

उनका प्रभाव इतना बढ़ा कि लोग उन्हें “सम्राट महेंद्र गोप” कहने लगे। वह वेश बदलने के उस्ताद थे। कभी औरतों का परिधान पहनकर, तो कभी अर्थी पर मृतक बनकर पुलिस की आंखों के सामने से बचकर निकल जाना उनका तरीका था।
सफेद घोड़े वाला महानायक
महेंद्र गोप की सबसे प्रसिद्ध छवि सफेद घोड़े पर सवार योद्धा की है। यह छह फ़ुट ऊंचा तेज़-तर्रार घोड़ा उन्हें सभापति सिंह नामक समर्थक ने भेंट किया था।
उनकी युद्ध-रणनीति ब्रिटिश “टॉमी” सैनिकों के लिए डर का कारण बन जाती थी। मुठभेड़ों के दौरान वे अक्सर अपने घोड़े पर उल्टी दिशा में बैठकर गोलियां चलाते हुए घने जंगलों में गायब हो जाते थे।
भारत छोड़ो आंदोलन में प्रभाव
मई 1943 में उनका दस्ता प्रसिद्ध सियाराम दल के साथ विलय कर दिया गया। उनकी गतिविधियों से प्रशासन हिल गया।
● बेलहर हमला 26 नवंबर 1942 को उन्होंने बेलहर थाना पर हमला कर एक क्रांतिकारी को छुड़ाने का प्रयास किया और पुलिस से आमने-सामने गोलीबारी की।
● सनबर्सा हमला 29 अगस्त 1943 को सियाराम सिंह के साथ मिलकर उन्होंने सनबर्सा थाना पर धावा बोला। इसके बाद उन्होंने पासराहा स्टेशन के सरकारी कोष पर कब्जा कर लिया।
उनके बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए रांची में बिहार के गर्वनर की अध्यक्षता में विशेष बैठक बुलाई गई। अंग्रेज़ सरकार ने गुरखा बटालियन और “टॉमी टास्क फ़ोर्स” जैसी विशेष छावनियां लगाकर उन्हें पकड़ने का अभियान चलाया।
विश्वासघात और शहादत
अंत में उन्हें अंग्रेज़ों ने बहादुरी से नहीं, बल्कि बीमारी और विश्वासघात की वजह से पकड़ा। सितंबर 1944 में वे तेज़ बुखार से पीड़ित थे और सुइया जंगल के एक झोपड़े में प्राकृतिक उपचार ले रहे थे।
इसी दौरान एक मुख़बिर राधे ने उनकी जानकारी पुलिस को दे दी। 8 सितंबर 1944 को अंग्रेज़ी फ़ोर्स ने झोपड़ी को चारों ओर से घेर लिया। बीमारी की हालत में भी सैनिक उनकी दहशत से इतने भयभीत थे कि कई घंटे तक अंदर जाने की हिम्मत न जुटा सके।
गिरफ्तारी के वक्त हजारों ग्रामीण “महेंद्र गोप ज़िंदाबाद” के नारे लगाते हुए उमड़ पड़े। उन पर राजद्रोह का मामला चलाया गया और फांसी की सजा सुनाई गई।
13 नवंबर 1945 को भागलपुर सेंट्रल जेल में उन्हें फांसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु मात्र 33 वर्ष थी। आज उनके पैतृक गांव रामपुर में सफेद घोड़े पर सवार उनकी प्रतिमा स्वतंत्रता की कीमत का मौन स्मारक बनकर खड़ी है।
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